(N/A) पुनरावशोषण:
प्रतिदिन बनने वाले निस्यंद (filtrate) के आयतन $(180 \text{ लीटर प्रतिदिन})$ और उत्सर्जित मूत्र के आयतन $(1.5 \text{ लीटर})$ की तुलना यह दर्शाती है कि निस्यंद का लगभग $99\%$ भाग वृक्क नलिकाओं द्वारा पुनरावशोषित कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया को पुनरावशोषण कहते हैं।
यह प्रक्रिया वृक्क नलिका के विभिन्न भागों में होती है। उदाहरण के लिए,निस्यंद में मौजूद ग्लूकोज,अमीनो एसिड और $Na^{+}$ जैसे पदार्थों का सक्रिय परिवहन द्वारा पुनरावशोषण होता है,जबकि नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों का $PCT$ में निष्क्रिय परिवहन द्वारा अवशोषण होता है।
$PCT$ से दूर बहने वाला निस्यंद हेनले के लूप में सांद्रित हो जाता है। यदि हेनले के लूप की लंबाई अधिक होती है,तो मूत्र अधिक सांद्रित होता है।
स्राव:
यह प्रक्रिया $DCT$ में होती है जहाँ नलिकाकार कोशिकाएं $H^{+}$,$K^{+}$ और अमोनिया जैसे पदार्थों को निस्यंद में स्रावित करती हैं। ग्लोमेरुलर निस्यंदन के दौरान ये पदार्थ छन नहीं पाते हैं। अमोनिया,यूरिक एसिड,$H^{+}$ आयन और पेनिसिलिन जैसी औषधियां इस प्रकार स्रावित होती हैं।
इस प्रकार,मूत्र का निर्माण होता है जिसे संग्रह नलिका में भेजा जाता है। संग्रह नलिका में जल का अवशोषण होता है और अत्यधिक सांद्रित मूत्र को वृक्क श्रोणि (renal pelvis) में खाली कर दिया जाता है।